कल क्या होगा ?
कल क्या होगा ?
कल की सोच में डर-डर के जीते इंसान पर एक व्यंगात्मक कविता |
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कल क्या होगा सोच-सोच कर
आज का जीना भूल गया
कैसी है इंसान की फितरत
बिन फंदे ही, झूल गया |
आज दिवाली, आज मिठाई
आज पटाखे खूब चले
कल क्या होगा,सोच-सोच कर
ये पागल बिन आग जले |
वक़्त किसी के बांधे से
सोचो तो कब बंध पाया है
आज गया, जब बीत गया
कल को आना था, आया है |
आज की बरखा, आज का सावन
आज का बादल, बरस गया
ये प्यासा सहरा का पंछी
दो बूँद की खातिर तरस गया |
सुनील राणा ( 26 fab 2013 )
कल की सोच में डर-डर के जीते इंसान पर एक व्यंगात्मक कविता |
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कल क्या होगा सोच-सोच कर
आज का जीना भूल गया
कैसी है इंसान की फितरत
बिन फंदे ही, झूल गया |
आज दिवाली, आज मिठाई
आज पटाखे खूब चले
कल क्या होगा,सोच-सोच कर
ये पागल बिन आग जले |
वक़्त किसी के बांधे से
सोचो तो कब बंध पाया है
आज गया, जब बीत गया
कल को आना था, आया है |
आज की बरखा, आज का सावन
आज का बादल, बरस गया
ये प्यासा सहरा का पंछी
दो बूँद की खातिर तरस गया |
सुनील राणा ( 26 fab 2013 )

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