MY THIS POEM IS DEDICATED TO OUR BEST FRIEND -- KIRAN
मेरी ये कविता समर्पित है हमारी बहुत प्यारी बल्कि सबसे प्यारी दोस्त किरन को ( क्योँ की उसके हाथ जोड़कर प्रार्थना करने पर ही मैंने उसके लिए इसे लिखा है )
आज उसके ३२वे जन्मदिन पर | ये कविता महज़ कुछ शब्दों या पंक्तियों के ही मेल से नहीं बनी है | ये कविता बनी है उस प्रेम से ,उस दोस्ती से ,उस एहसास से और उन भावनाओ के संगम से जो हम सभी दोस्त किरन के प्रति महसूस करते हैं क्योंकि वो सचमुच एक छोटे बच्चे की तरह निश्छल ,निष्कपट और मासूम है | हम सभी उसकी लम्बी उम्र और खुशहाल जीवन की कामना करते हैं |
किरन
***********
है अँधेरा बहुत और
सब दिए बुझ गए हैं
रौशनी की मगर वो
एक किरन जल रही है |
ना सत्य है ,ना धर्म है
ना भरोसा है जहाँ में
यकीं की मगर वो
एक किरन पल रही है |
हैं दोस्तों की ,दोस्ती की
मिसालें बहुत और भी पर
वो कुछ अलग है मेरे दोस्तों
वो जो साँसों के संग
हमारी साँसों में बसकर
धडकनों के संग -संग
धडकनों सी चल रही है |
वो है गैर फिर भी
है अपनों से बढ़कर
वो जो चिंगारी
*परवेज़ तेरे घर
जल रही है|
वो किरन है जिंदगी की
वो किरन है खुशी की
वो किरन दोस्ती की
वो किरन बंदगी की
वो किरन है जो मोहब्बत के
साये में पलकर ,किरन बनकर
दिवाली के हर एक दिए में
रौशनी की एक -एक
किरन में ढल रही है | है अँधेरा बहुत और
सब दिए बुझ गए हैं
रौशनी की मगर वो
एक किरन जल रही है |
*परवेज़ - परवेज़ आलम, हमारे अजीज़ मित्र और किरन के पति |
-: सुनील राणा
मेरी ये कविता समर्पित है हमारी बहुत प्यारी बल्कि सबसे प्यारी दोस्त किरन को ( क्योँ की उसके हाथ जोड़कर प्रार्थना करने पर ही मैंने उसके लिए इसे लिखा है )
आज उसके ३२वे जन्मदिन पर | ये कविता महज़ कुछ शब्दों या पंक्तियों के ही मेल से नहीं बनी है | ये कविता बनी है उस प्रेम से ,उस दोस्ती से ,उस एहसास से और उन भावनाओ के संगम से जो हम सभी दोस्त किरन के प्रति महसूस करते हैं क्योंकि वो सचमुच एक छोटे बच्चे की तरह निश्छल ,निष्कपट और मासूम है | हम सभी उसकी लम्बी उम्र और खुशहाल जीवन की कामना करते हैं |
किरन
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है अँधेरा बहुत और
सब दिए बुझ गए हैं
रौशनी की मगर वो
एक किरन जल रही है |
ना सत्य है ,ना धर्म है
ना भरोसा है जहाँ में
यकीं की मगर वो
एक किरन पल रही है |
हैं दोस्तों की ,दोस्ती की
मिसालें बहुत और भी पर
वो कुछ अलग है मेरे दोस्तों
वो जो साँसों के संग
हमारी साँसों में बसकर
धडकनों के संग -संग
धडकनों सी चल रही है |
वो है गैर फिर भी
है अपनों से बढ़कर
वो जो चिंगारी
*परवेज़ तेरे घर
जल रही है|
वो किरन है जिंदगी की
वो किरन है खुशी की
वो किरन दोस्ती की
वो किरन बंदगी की
वो किरन है जो मोहब्बत के
साये में पलकर ,किरन बनकर
दिवाली के हर एक दिए में
रौशनी की एक -एक
किरन में ढल रही है | है अँधेरा बहुत और
सब दिए बुझ गए हैं
रौशनी की मगर वो
एक किरन जल रही है |
*परवेज़ - परवेज़ आलम, हमारे अजीज़ मित्र और किरन के पति |
-: सुनील राणा


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